Atmospheric humidity Compaction Rainfall Geography Hindi Notes

वायुमंडलीय आर्द्रता

हालाँकि वायुमण्डल में जलवाष्प (आर्द्रता) का अनुपात कम ही (शून्य से लेकर 4 प्रतिशत तक) है फिर भी किसी भी स्थान के मौसम और जलवायु पर इसका प्रभाव पड़ता ही है। जल वायुमण्डल में तीनों रूपों में उपस्थित रह सकता है । यह जल वाष्प के रूप में गैसीय अवस्था में रह सकता है । जल की बूंदों के रूप में तरल अवस्था में रह सकता है तथा हिमकणों के रूप में ठोस अवस्था में रह सकता है ।

ये तीनों ही रूप आपस में मिलकर किसी स्थान के वायुमण्डल की आर्द्रता का निर्धारण करते हैं । इस प्रकार हम वायुमण्डल में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा को आर्द्रता कहते हैं ।यह जलवाष्प ही है, जो मुख्यतः अपनी स्थिति में परिवर्तन करके ओस, पाला, मेघ, कुहरा और हिम वृष्टि के रूप में परिवर्तित होती है ।

जलवाष्प के स्रोत –

  • महासागरों के धरातल जलवाष्प का सबसे बड़ा स्रोत हैं ।
  • पृथ्वी पर मौजूद जलीय वनस्पतियाँ तथा दलदली भूमि भी थोड़ी मात्रा में वायुमण्डल को जल वाष्प प्रदान करते हैं ।

जल चक्र –

धरातल से वायुमण्डल में और फिर वायुमण्डल से धरातल में आर्द्रता के लेन-देन का एक निरन्तर चक्र चलता रहता है । जलाशय के विभिन्न स्रोतों से वाष्पीकरण के द्वारा जल वाष्प वायुमण्डल में पहुँचता रहता है । अनुकुल परिस्थितियाँ पाकर यह जल वाष्प संघनित होकर बादल बनते हैं और बादलों से वर्षा के द्वारा यह जल वाष्प फिर से जलाशयों में पहुँच पाता है । यह चक्र निरन्तर जारी रहता है ।

कुछ महत्त्वपूर्ण तथ्य –

  • जिस स्थान पर तापमान जितना अधिक होगा, वहाँ की वायु में आर्द्रता ग्रहण करने की शक्ति उतनी ही अधिक होगी । जबकि ठीक इसके विपरीत तापमान कम होने पर हवा की नमी सोखने की शक्ति कम हो जाती है । इसलिए विषुवत रेखीय हवाओं में आर्द्रता ग्रहण करने की शक्ति उच्च अक्षांशों वाली हवाओं से अधिक होती है ।
  • ठीक इसी प्रकार ऊँचाई बढ़ने के साथ-साथ आर्द्रता तेज़ी से कम होने लगती है ।
  • वायुमण्डल की आर्द्रता का स्थानान्तरण अक्षांशीय पट्टियों के बीच होता है ।
  • प्रत्येक गोलाद्र्धों में 10 अंश से 40 अंश अक्षांशों के बीच (शुष्क कटिबन्ध) वर्षण की तुलना में वाष्पन अधिक होता है ।



जल की परिवर्तन की प्रक्रियाएँ – जल के स्वरूप में परिवर्तन निम्न तीन प्रक्रियाओं द्वारा होता है-

(1) वाष्पीकरण – जब कोई द्रव पदार्थ किसी तापमान पर गैस में परिवर्तन होने लगता है, तो इस प्रक्रिया को वाष्पीकरण कहते हैं ।

(2)
संगलन – (Fusionयह ठोस पदार्थ के द्रव में बदलने की स्थिति है । ध्यान रखने की बात यह है कि इस प्रक्रिया में पदार्थ के तापमान में कोई बदलाव नहीं आता । उदाहरण के लिए बर्फ का पिघलकर पानी बन जाना ।

कुछ तथ्य –

  • एक निश्चित तापमान पर एक ग्राम बर्फ को एक ग्राम जल में बदलने के लिए 80 ग्राम कैलोरी ऊष्मा की जरूरत होती है । इसे संगलन की ‘गुप्त ऊष्मा’ कहते हैं ।
  • वायु एक निश्चित ताप पर जलवाष्प की जो अधिकतम मात्रा ग्रहण कर सकता है, उसे वायु की ‘‘आर्द्र क्षमता’’ कहते हैं ।
  • वायु में अगर उसकी आर्द्र क्षमता के बराबर जलवाष्प मौजूद है, तो वह और अधिक जलवाष्प ग्रहण नहीं कर सकती, तो उस वायु को ‘संतृप्त वायु’ (सेचुरेटेड विंड) कहते हैं।
  • जिस तापमान पर वायु संतृप्त हो जाती है उसे उसका ‘ओशांक विन्दु (Dew Point)  कहते हैं । स्पष्ट है कि यदि तापमान ओशांक विन्दु से भी कम हो गया है तो इस संतृप्त वायु का संघनन होने लगेगा ।

(3) संघनन – संघनन का संबंध वायु की संतृप्त अवस्था से है । जैसा कि बताया गया है जब वायु की सापेक्ष आर्द्रता 100 प्रतिशत हो जाती है अर्थात् वह संतृप्त हो जाती है, तो संघनन शुरु हो जाता है । यह एक प्रकार से जलवाष्प के तरल में बदलने की प्रक्रिया है ।

संघनन दो कारकों पर निर्भर करता है । पहला, यह कि वायु की आपेक्षिक आर्द्रता कितनी है । उदाहरण के लिए मरुस्थलीय क्षेत्रों में वायु को ओशांक विन्दु पर पहुँचने के लिए अधिक मात्रा में ठण्डा होने की जरूरत पड़ती है जबकि आर्द्र जलवायु में शीतलता की कम मात्रा से भी संघनन की प्रक्रिया शुरू हो जायेगी ।

दूसरा, कोई भी संघनन की क्रिया उस समय तक पूरी नहीं हो सकती, जब तक ऐसा आधार मौजूद न हो, जिस पर द्रव संघनित हो सके । इसलिए इस दृष्टि से वायुमण्डल में धूल कणों की उपस्थिति बहुत मायने रखती है । समुद्री नमक, सल्फर आक्साइड, नाइट्रोजन आक्साइड, ज्वालामुखी की राख और महीन धूल कणों के चारों ओर ही संघनन का होना संभव है ।

संघनन के रुप –

(1) ओस – जमीन के निकट की हवा में जलवाष्प की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक होती है । जब यह जलवाष्प संघनन की प्रक्रिया के द्वारा बूंदों में बदल जाती है  तो ओस बनता है । ओस मुख्यतः रात में विकीरण के द्वारा धरातल से सटी हुई वायु की परत के ठण्डे होने से बनती है। बूँदों में परिणित होने के बाद इसका वजन थोड़ा बढ़ जाता है, जिसे हवा संभाल नहीं पाती। इसके फलस्वरूप ये कण पौधों और घास पर गिर जाते हैं ।

ओस के बनने के लिए निम्न परिस्थितियाँ आवश्यक होती हैं

  • आकाश साफ और बादलों से रहित होना चाहिए, ताकि सौर विकीरण से अधिक ऊष्मा प्राप्त हो सके ।
  • हवा शान्त हो, ताकि जल वाष्प के ठण्डे होने में कोई बाधा न आने पाये ।
  • वायुमण्डल में पर्याप्त मात्रा में आर्द्रता होनी चाहिए ।
  • रात अपेक्षाकृत लम्बी हो, ताकि जलवाष्प को ठण्डा होने के लिए अधिक समय मिल सके । ज्ञातव्य है कि ओस की बूँदें सर्दी के मौसम में सबसे ज्यादा बनती है और इस समय रात लम्बी होती है।

(2) तुषार (पाला )(Frost)  – जब धरातल का तापमान हिमांक (शून्य अंश डिग्री सेल्सियस) से भी नीचे आ जाता है, जब वायुमण्डल में मौजूद जलवाष्प जल बूँदों में बदलने के स्थान पर हिम कणों के रूप में बदल जाती हैं । इसे ही तुषार या पाला कहते हैं । यह फसलों के लिए बहुत नुकसानदेह होती है ।
तुषार बनने के लिए भी उन्हीं परिस्थितियों की आवश्यकता होती है, जो ओस के बनने के लिए । फर्क केवल इतना है कि तुषार के लिए तापक्रम का हिमांक विन्दु से नीचे होना आवश्यक है ।

(3) कुहरा (Fog)  – इसके निर्माण में भी जलवाष्प की ही भूमिका होती है । यह एक प्रकार का बादल ही होता है, जो जमीन के बहुत निकट होता है । धरातल से सटी हुई जलवाष्पयुक्त हवा जब काफी मात्रा में शीतल हो जाती है, तब वायु में लदे हुए जल कणों के कारण वायुमण्डल की दृश्यता प्रभावित होने लगती है । इसे ही कुहरा कहते हैं ।
कुहरा और बादल में मुख्य अन्तर यह होता है कि कुहरे का निर्माण करने वाले जल कणों का व्यास 100 माइक्रान से कम होता है । जबकि वर्षा के बूँदों का व्यास 400 से 1000 माइक्रान होता है । कहने का अर्थ यह कि कुहरे की बूँदें वर्षा के बूँदों से काफी छोटी होती हैं।

(4) धुआंसा् (Smog)  – यह धुंआ  (Smoke) तथा कुहाँसा (Smoke)  से मिलकर बना हुआ शब्द है। इस प्रकार इसे हम धुँए का कुहरा कह सकते हैं । यह अक्सर या तो ज्वालामुखी उद्गार के बाद वहाँ के वातावरण में छा जाता है, या फिर उन शहरों में छाया रहता है, जहाँ ऐसे कारखाने बहुत अधिक है, जिनसे दिन-रात धुँआ निकलता रहता है । होता यह है कि धुँए के कण वायुमण्डल में छाकर जलवाष्प को एकत्रित होने के लिए आधार प्रदान कर देते हैं । ठंड के दिनों में इन कणों के चारों ओर संघनन की शुरूआत हो जाती है, जिससे वातावरण में धुआँसा फैल जाता है। यह भी एक प्रकार का कुहरा ही है, लेकिन धुएं से भरा हुआ । यदि सफेद धुआँसे में कपड़ा रात भर के लिए बाहर सुखा दिया जाए, तो सुबह तक उसका रंग थोड़ा-थोड़ा काला पड़ जायेगा जबकि कुहरे के साथ ऐसा नहीं होगा ।

(5) कुहाँसा (Mist)  -वस्तुतः कुहाँसा और कुहरा एक ही हैं । अन्तर केवल इतना है कि कुहरे में जहाँ दृश्यता बहुत अधिक प्रभावित होती है, वहीं कुहाँसे में दृश्यता उससे कम प्रभावित होती है ।

(6)
धुंध (Haze) . धुंध शब्द का प्रयोग उन सभी के लिए किया जाता है, जिनसे दृश्यता प्रभावित होती है । इसका निर्माण धुँए, धूल तथा लवण आदि कणों के आसपास जल के कणों के इकट्टा हो जाने के कारण होता है । मौसम विज्ञान की भाषा में धुंध को वायुमण्डल के नीचले भाग की दृश्यता को प्रभावित करने वाला माना गया है ।

(7) बादल – वायुमण्डल में संघनन की प्रक्रिया लगातार चलती रहती है । जब जलवाष्प के संघनन से निर्मित हिम कण या जल से भरी हुई वायु राशि धरातल के विभिन्न ऊँचाइयों पर फैल जाती है, तो उसे बादल कहा जाता है । ये बादल कुहरे की तुलना में अधिक ऊँचाई पर पाए जाते हैं ।
जब इन जल कणों का आकार बहुत छोटा होता है तब तक वे वायुमण्डल में तैरते रहते हैं । पर जब उनका आकार इतना बड़ा हो जाता है कि वायुमण्डल की तरंगें उन्हें रोक नहीं पाती, तब वे पृथ्वी पर गिर पड़ती हैं, जिसे वर्षा कहतें हैं ।
सामान्य तौर पर भूमध्य रेखा पर बादल अधिक ऊँचाई पर स्थित होते हैं । और जैसे-जैसे हम धु्रवों की ओर बढ़ते जाते हैं, बादलों की ऊँचाइयाँ कम होती जाती है ।


बादलों के प्रकार –

बादलों के प्रकारों का वर्गीकरण उनकी ऊँचाई, उनके आकार, उनके रंग तथा प्रकाश को परावर्तित करने की उनकी क्षमता के आधार पर किया गया है । ऊँचाई के आधार पर बादलों के दस प्रकार माने गये हैं, और इन्हें तीन मुख्य वर्गों में रखा गया है । ये वर्ग हैं –
(1) उच्च मेघ (5 से 14 किलोमीटर)
(2) मध्य मेघ (2 से 7 किलोमीटर) तथा
(3) निम्न मेघ (2 किलोमीटर से नीचे)

(1) उच्च मेघ – धरातल से इनकी ऊँचाई 5 से 14 किलोमीटर के बीच होती है । ये तीन प्रकार के होते हैं –

(i) पक्षाम मेघ ( Cirrus Clouds) – चूँकि इसकी रचना हिम कणों से होती है, इसलिए ये पंखनुमा होते हैं । पृथ्वी पर से ये बहुत कोमल और सफेद रेशम की तरह दिखाई देते हैं । ऐसा लगता है मानों कि इनका निर्माण पंखों के रेशों से हुआ हो । जब ये आकाश में अव्यवस्थित तरीके से फैले होते हैं, तब इन्हें साफ मौसम का प्रतीक माना जाता है । इसके ठीक विपरीत यदि ये व्यवस्थित तरीके से फैले हों, और इनका रंग भी साफ न हो, तो मौसम में गड़बड़ी होने की संभावना बढ़ जाती है ।

(ii) पक्षाभ-स्तरी मेघ (Sirro stratus clouds)  – ये मेघ देखने में सफेद पतले-पतले जैसे दिखाई देते हैं । इसके कारण आकाश का रंग दुधिया हो जाता है । इन मेघों के फैलने से सूर्य और चन्द्रमा के चारों ओर प्रभा-मण्डल बन जाता है । सामान्यतया ये आने वाले तूफान की सूचना देते हैं ।

(iii) पक्षाभ-कपासी मेघ – ये बादल छोटे-छोटे पत्रकों अथवा छोटे गोलाकार ढेरों के रूप में पाये जाते हैं । इनकी कोई छाया पृथ्वी पर नहीं पड़ती । इन बादलों को ‘मैकेरल स्काइर्’ भी कहा जाता है ।

(2) मध्य मेघ – इनकी ऊँचाई 2 किलोमीटर से 7 किलोमीटर तक होती है । ये दो प्रकार के होते हैं –

(i) मध्य स्तरीय मेघ – ये आकाश में भूरे तथा नीले रंग के होते है,ं जो मोटी परतों के रूप में फैले रहते हैं । जब ये बहुत घने हो जाते हैं, तब सूर्य और चन्द्रमा तक स्पष्ट दिखाई नहीं देते । साधारणतया इनसे दूर-दूर तक और लगातार बारिश होती है ।

(ii) मध्य कपासी मेघ – इनका रंग भूरा और श्वेत होता है । ये पंक्तिबद्ध या लहरों के रूप में पाए जाते हैं । अक्सर इनकी छाया पृथ्वी पर दिखाई देती है –

(3) निम्न मेघ – धरातल से 2 किलोमीटर की औसत ऊँचाई पर पाए जाने वाले मेघ निम्न मेघ कहलाते हैं । ये तीन प्रकार के होते हैं –

(i) स्तरीय कपासी मेघ
(ii) स्तरीय मेघ तथा
(iii) वर्षा स्तरीय मेघ ।

इनमें से वर्षा स्तरीय मेघों से लगातार जल वृष्टि या हिम वृष्टि होती है । ये बहुत सघन और काले रंग के होते है, जिनसे धरती पर अंधेरा तक छा जाता है ।

(4) उघ्र्वाधर विकास वाले मेघ –

14 किलोमीटर से अधिक की ऊँचाई पर कुछ मेघ फैले होते हैं, जिनकी ऊँचाई लगभग 18 किलोमीटर या इससे अधिक होती है । इस श्रेणी के अन्तर्गत दो प्रकार के मेघों की चर्चा की जाती है –

(i) कपासी मेघ (cumulus cloud) – ये बहुत अधिक घने और विस्तृत होते हैं । ये देखने में धुनी हुई रुई के ढेर जैसी दिखाई देते हैं । ये गुम्बदाकार या फूल गोभी जैसे आकार के होते हैं । इनका आधार काले रंग का होता है ।
(ii) कपासी वर्षा मेघ (Cumulo Nimbus clouds) – ये सबसे अधिक लम्बवत विकास वाले बादल होते हैं । इनसे तेज़ बौछार के रूप में वर्षा होती है । साथ ही ओले और तूफान भी आते हैं ।

कुछ महत्त्वपूर्ण तथ्य –

  • हर प्रकार के बादलों से वर्षा नहीं होती ।
  • वे बादल; जो वर्षा कराने से पहले वाष्पीकृत हो जाते हैं, जलवायु की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होते हैं । किसी भी समय पृथ्वी का आधा भाग बादलों से ढका रहता है । लेकिन केवल तीन प्रतिशत भाग पर ही वर्षा होती है ।
  • बादल सौर विकीरण का अवशोषण भी करते हैं और परावर्तन भी । यह सौर विकीरण के 30 प्रतिशत भाग को अंतरिक्ष में परावर्तित कर देते हैं ।
  • बादल किसी भी स्थान के दैनिक तापांतर को कम करते हैं ।
  • जिन बादलों का निर्माण वायु के धीरे-धीरे उठने से होता है, उनका विकास परतों के रूप में होता है ।

वर्षा के प्रकार

बादलों के अन्दर मौजूद पानी या हिम के कण जब पृथ्वी पर गिरने लगते हैं, तो उसे वर्षा कहते हैं । वर्षा तब होती है जब बादलों के भीतर बहुत तेजी के साथ संघनन होने लगता है और हवा इन संगठित कणों के वजन को संभाल नहीं पाती ।

किसी स्थान पर वर्षा का होना निम्न परिस्थितियों पर निर्भर करता है –

  • तापमान, जिस पर जलवाष्प का संघनन होता है तथा
  • बादलों के प्रकार आदि ।
  • वर्षा के निम्न प्रकार होते हैं

वर्षा के प्रकार –

(1) वर्षा – इसके अन्तर्गत जल की बूंदें गिरती हैं । इन जल की बूंदों का निर्माण संघनन की प्रक्रिया से बनी छोटी-छोटी बूंदों के मिलने से होता है । इन बूँदों का आकार 0.5 मिलीमीटर से 1.5 मिलीमीटर हो सकता है ।
(2) फुहार – जब वर्षा की बूँदों का आकार बहुत ही छोटा (आधे मिलीमीटर से भी कम) होता है, तो ऐसी बूँदों को फुहार कहते हैं । फुहार स्तरीय व कपासी मेघों द्वारा ही होती है ।
(3) सहिम वर्षा – जैसा कि शब्द से ही स्पष्ट है, जब वर्षा की बूँदों के साथ हिम के भी कण गिरने लगते हैं, तो उसे सहिम वर्षा कहा जाता है ।
(4) हिमपात – जब संघनन जमाव विन्दु से नीचे चला जाता है, तब जलवाष्प हिम के छोटे-छोटे कणों में परिवर्तित हो जाते हैं । ये ही छोटे-छोटे कण आपस में मिलकर विभिन्न आकारों में गिरते रहते हैं ।
(5) ओलावृष्टि – यदि वर्षण के फलस्वरूप हिम के कण गोले बन जाएं, तो इसके गिरने को ओले की वृष्टि कहा जाता है । सामान्यतया ये कपासी मेघ के वर्षा से बनते हैं ।
(6) बादल फटना – जब एक ही विशेष प्रकार के आवेश कणों वाले बादल एक जगह पर सघनता से इकट्ठे होते हैं, जिनके एक ओर गर्म तो दूसरी ओर ठंडी हवाएं हों, तो इनके परस्पर दबाव के कारण ही बादल  फट जाते हैं । इस दौरान होने वाली बारिश इतनी ज्यादा होती है कि इसे मापना कठिन हो जाता है । एक घंटे में सौ से दो सौ मिलीमीटर यानी चार से आई इंच तक पानी गिरता है । इस दौरान बारिश की बूंदों का आकार पांच मिलीमीटर से भी बड़ा हो सकता है । ये बूँदें 10 मीटर प्रति सेकंड यानी 36 किलोमीटर प्रति घंटे के रफ्तार से धरती पर गिर सकती हैं । पानी का यही वेग अपने रास्ते में आने वाले घरों-आदमियों को बहा ले जाता है और तबाही का कारण बनता है ।
बादल फटने की घटनाएं अक्सर मानसून के दिनों में ही होती हैं, क्योंकि इसी मौसम में गर्म और ठंडी, दोनों तरह की हवाएं मौजूद होती हैं । ये हादसे अक्सर होते भी पहाड़ी के ऊपर से गुजरने वाली गर्म हवाएं और किसी मैदान या नदी के ऊपर से गुजरने वाली ठंडी हवाएं मिलकर इस प्रक्रिया को जन्म देती हैं । लेकन पहले से सही व सटीक जानकारी दे पाने में मौसम विज्ञानी भी असमर्थ हैं ।

वर्षा की दशाएँ –

स्पष्ट है कि वर्षा गर्म और आर्द्र हवाओं के संघनन से होती है । यह संघनन निम्न तीन विधियों द्वारा सम्पन्न होकर वर्षा करती है –

(i) संवहनीय वर्षा  धरातल के निचले स्तर पर नम हवा उपस्थित रहती हैं । यह हवा गर्म होने पर ऊपर उठकर फैलती है । ऊपर जाने के कारण यह ठण्डी होने लगती है । ठण्डी होने के बाद यह अपनी कुछ आर्द्रता नीचे गिरा देती है, जिसे हम संवहनीय वर्षा के नाम से जानते हैं । इस तरह की वर्षा निम्न अक्षांशों में गर्मी के दिनों में अक्सर होती है । यह अक्सर दिन के सबसे गर्म हिस्से के बाद अल्पकाल किन्तु भारी बौछार के रूप में आती है । इस वर्षा के साथ बादल गरजते हैं और बिजलियाँ कड़कती है  । उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में दोपहर के बाद प्रतिदिन होने वाली वर्षा संवहनीय वर्षा ही होती है ।

(ii)  पर्वतीय वर्षा – वैसे तो आर्द्र हवा निचले धरातल पर रहती है । लेकिन जब इसके मार्ग में कोई पर्वत या कोई अन्य ऊँचा भू-भाग आ जाता है, तो यह आर्द्र हवा उस भू-भाग से टकराकर ऊपर उठने के लिए मजबूर हो जाती है । ऊपर उठने से यह ठण्डी होती है । ठण्डी होने के कारण इसमें संघनन होने लगता है, जिससे जलवाष्प भारी हो जाता है । यही भारी जल वाष्प वर्षा के रूप में पहाड़ों पर गिर जाते हैं।

वर्षा के बाद यह हवा प्रतिपवन (Leeward) दिशा में उतरती है यहाँ यह गर्म होने लगती है । यद्यपि इन गर्म हवाओं में आर्द्रता ग्रहण करने की शक्ति आ जाती है, लेकिन इसे आर्द्रता का स्रोत नहीं मिल पाता । इसी कारण प्रतिपवन दिशा में मौसम गर्म और शुष्क हो जाता है । और ये गर्म हवाएँ पर्वत के दूसरी ओर वर्षा नहीं कर पातीं, जिसे ‘वृष्टि छाया’ प्रदेश, (Rain Shedow Area) कहते हैं । विश्व के अनेक मरुस्थल इसी प्रकार के हैं ।

पर्वतीय वर्षा भी अधिकांशतः संवहनीय प्रकार की ही वर्षा होती है, जिसके अंतर्गत गरज-चमक के साथ वर्षा होती है । भारत में खासी पहाडि़यों की ढलानों पर भारी वर्षा मानसूनी एवं संवहनीय वर्षा के सम्मिलित प्रभाव के कारण होती है ।

(iii)चक्रवाती वर्षा – यह वर्षा निम्न दाब वाले क्षेत्रों में होती है । अत्यधिक दाब के कारण इस क्षेत्र में चारों ओर से हवाएँ आकर एक-दूसरे से मिलती हैं । ऐसी स्थिति में ठण्डी हवा नीचे और गर्म हवा ऊपर आ जाती है । जब ये हवाएँ आपस में मिलती हैं तो एक-दूसरे के क्षेत्रों में प्रवेश करने की कोशिश करती हैं इसी से वर्षा होती है ।
डोलड्रमों पर सामान्यतया चक्रवाती वर्षा ही होती हैं, क्योंकि यहाँ व्यापारिक हवाएँ मिलती हैं । ऊष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में भी चक्रवातों के कारण भारी वर्षा होती है । परन्तु यह वर्षा मात्र कुछ घंटे तक ही जारी रहती है ।

(iv) तूफान – यह स्थानीय प्रकृति का तीव्र तूफान होता है । जब जमीन बहुत अधिक गर्म हो जाती है और हवा में बादलों के बनने के लिए पर्याप्त नमी रहती है, तब वर्षा तूफानी गरज और चमक के साथ होती है । यह स्थिति भूमध्य रेखीय क्षेत्रों में अक्सर आती है।

वर्षा का वैश्विक स्वरूप

विश्व में वर्षा का पैटर्न बहुत जटिल है इसलिए केवल मोटा पेटर्न ही बनाया जा सकता है । इस पैटर्न को निम्न विन्दुओं में देखना अधिक व्यावहारिक होगा –

  • भूमध्यरेखीय क्षेत्रों में सूर्य के सीधे चमकने से तापमान अधिक होता है । वायुमण्डल के शुष्क होने के कारण उसकी नमी धारण करने की क्षमता अधिक बढ़ जाती है । चूँकि यह क्षेत्र विस्तृत समुद्र के निकट है, इसलिए यहाँ की शुष्क हवा में आर्द्रता मिलने लगती है । फलस्वरूप भूमध्यरेखीय क्षेत्रों में वर्षा सबसे अधिक होती है ।
  • इसके विपरीत चूँकि ध्रुवों में वायु का तापमान कम रहता है, इसलिए वहाँ वर्षा बहुत कम होती है ।
  • मध्य अक्षांश की स्थिति इन दोनों के बीच की है । इसके बीच में जो विशाल स्थलीय भाग है, उसमें सामान्यतः अन्तर बढ़ने के साथ-साथ वर्षा कम होती जाती है । जबकि हवाओं की दिशा में मौजूद पर्वत के ढालों पर खूब वर्षा होती है । इसके विपरीत स्थल का क्षेत्र वृष्टि छाया में आ जाता है ।
  • स्थानीय स्थल की ऊँचाई भी वर्षा को प्रभावित करती है । सामान्य तौर पर दो किलोमीटर ऊँचाई तक ऊँचाई बढ़ने के साथ-साथ वर्षण में भी वृद्धि होती है । लेकिन उसके बाद नहीं । अब चूँकि वायु में ठण्डक अधिक हो जाती है, जिसके कारण उसकी आर्द्रता ग्रहण करने की शक्ति भी कम हो जाती है, इसलिए वर्षा भी कम होने लगती है ।
  • भूमध्यरेखीय प्रदेश, शीतोष्ण कटिबन्ध के पश्चिमी तट,पूर्वोन्मुखी ढाल तथा मानसूनी क्षेत्रों के तटीय भागों में भारी वर्षा होती है । यहाँ वर्षा 200 सेन्टीमीटर वार्षिक से भी अधिक है ।
  • ऊष्ण कटिबन्धीय क्षेत्र के मध्य आन्तरिक भागों में वर्षा अपर्याप्त है, जो 50 से 100 सेन्टीमीटर वार्षिक है ।
  • वृष्टिछाया वाले प्रदेश, महाद्वीपों के भीतर भाग तथा उच्च अक्षांश निम्न वर्षा के क्षेत्र हैं । यहाँ वार्षिक वर्षा 50 सेन्टीमीटर से भी कम होती है । ऊष्ण कटिबन्ध में स्थित उप महाद्वीपों के पश्चिम भाग तथा शुष्क मरुस्थल इन्हीं के अन्तर्गत आते हैं ।
  • कुछ क्षेत्रों में वर्षा कुहरा, धुंध  और ओस के रूप में भी प्राप्त होती है जिसका वनस्पति पर अच्छा प्रभाव पड़ता है । मरुस्थलों में घना कुहरा वनस्पति का पोषण करता है । भारत के भी कुछ भागों में ओस व धुङ  गेहूँ की फसल का पोषण करते हैं ।

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