Rocks- Geography Notes in Hindi

चट्टान

वस्तुतः ; जिन्हें हम स्थल मण्डल कहते हैं, वे मूलतः शैल मण्डल ही हैं । पृथ्वी की ठोस परत को स्थल मण्डल कहा जाता है जो लगभग 100 किलोमीटर मोटी है । पृथ्वी को बनाने में 95 प्रतिशत योगदान चट्टानों का है । ये चट्टानें मुख्यतः खनिज पदार्थों से बने होते हैं । पृथ्वी पर जितनी चट्टानें पाई जाती हैं । उनमें 6 प्रकार के खनिजों की प्रमुखता होती है । ये खनिज हैं – क्वाटर्ज, अभ्रक, फेल्सबार, बायरोकसीन्स, एक्मीबोल्स तथा ओलिवीन ।

बनावट की प्रक्रिया के आधार पर पृथ्वी पर पाये जाने वाले समस्त चट्टानों को तीन भागों में विभाजित किया गया है –

(1) आग्नेय चट्टान
(2) अवसादी चट्टान, तथा
(3) रूपान्तरित चट्टान ।

(1) आग्नेय चट्टान – अंग्रेजी में इन्हें ‘इंग्नीयस रॉक्स’ कहा जाता है । जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इनके निर्माण में अग्नि का योगदान प्रमुख होता है । इनका निर्माण या तो ज्वालामुखी से निकलकर पृथ्वी पर फैले हुए लावा के ठण्डे हो जाने से होता है या फिर पृथ्वी के अन्दर ही धधक रहे मैग्मा के ठण्डे हो जाने से । उदाहरण के लिए बेसाल्ट काले रंग की आग्नेय चट्टान है, जो पृथ्वी के ऊपर लावा के ठण्डा होने से बनी है । जबकि ग्रेनाइट मोटे दानों वाली आग्नेय चट्टान है, जो पृथ्वी के अन्दर मैग्मा के धीरे-धीरे ठण्डा होने से बनी है ।

आग्नेय चट्टानों की निम्न विशेषताएँ होती हैं –

  • ये चट्टानें कठोर, रवेदार तथा परतहीन होती हैं ।
  • इन चट्टानों के बीच जीवाश्म नहीं पाये जाते ।
  • चूँकि इनमें पानी का प्रवेश कम हो पाता है, इसलिए इनमें रासायनिक अपक्षय की क्रिया भी बहुत कम होती है ।
  • इन चट्टानों में जोड़ पाये जाते हैं ।
  • चूँकि इन चट्टानों का निर्माण ही ज्वालामुखी से होता है, इसलिए ये चट्टानें ज्वालामुखी क्षेत्र में विशेष रूप से पाई जाती हैं ।
  • पृथ्वी के ऊपर लावा के ठण्डे होने से बनने वाली चट्टानों के कण भी छोटे-छोटे होते है , क्योंकि लावा अपेक्षाकृत जल्दी ठण्डा हो जाता है । जबकि इसके विपरीत पृथ्वी के अन्दर का मैग्मा धीरे-धीरे ठण्डा होता है, जिसके कारण इन चट्टानों के रवे मोटे हो जाते हैं ।





(2) अवसादी चट्टान – जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इन चट्टानों का निर्माण प्राचीन चट्टानों के टुकड़ों, जीवों के अवशेष, खनिज पदार्थों तथा अन्य वस्तुओं के अवसादों से होता है । हवा, पानी आदि तत्त्व जब लगातार इन वस्तुओं को बहाकर एक जगह पर इकठे  करते जाते हैं, तो बाद में ताप और दबाव के कारण यह एकत्र अवसाद चट्टान का रूप ले लेता है । उदाहरण के लिए बलुआ पत्थर बालु के कणों से बनता है, जो प्रत्यक्ष रूप से एक-दूसरे से जुड़ गये हैं । खडि़या करोड़ों छोटे-छोटे जीवों के छोटे-छोटे केल्शियम कार्बोनेट के टुकड़ों से मिलकर बना है ।

इन चट्टानों की मुख्य विशेषताएँ हैं:-

  • चूंकि अवसादी चट्टानें अवसादों के जमाव से बनते हैं, इसीलिए इन चट्टानों में परतें पाई जाती हैं। अतः इन्हें परतदार चट्टानें भी कहा जाता है ।
  • ये चट्टानें संगठित, असंगठित अथवा ढीली, किसी भी प्रकार की हो सकती हैं।
  • चूँकि ये चट्टानें कणों की सघनता की दृष्टि से कमजोर होती हैं इसलिए इनमें अपरदन का प्रभाव शीघ्र होता है ।
  • बालू का पत्थर, चीका मिट्टी, चूने का पत्थर, कोयला, शैल, खडिया़ तथा नमक की चट्टानों का निर्माण पृथ्वी के अन्दर अवसादों के निक्षेप से होता है ।
  • गर्म एवं शुष्क प्रदेशों में वायु के द्वारा भी अवसादी चट्टानों का निर्माण होता है । लोयस इसका उदाहरण है ।
  • ग्लेशियर के अपरदन से भी अवसादी चट्टानें बनती हैं । हिमोढ (मोरेन) इसी तरह की चट्टान है ।

(3) रूपान्तरित चट्टान – इन्हें कायान्तरित चट्टानें भी कहते हैं । ये चट्टानें ताप और दबाव के कारण नया रूप ग्रहण कर लेती हैं । उदाहरण के लिए चूने के पत्थर संगमरमर में तथा बालुका पत्थर का क्वार्टजाइट में बदल जाना । इसी प्रकार स्लेट तथा नीस भी रूपान्तरित चट्टानें हैं, जो क्रमशः चीका और ग्रेनाइट से परिवर्तित होती हैं । इन्हें परिवर्तित चट्टानें भी कहा जा सकता है।

इनकी निम्न विशेषताएँ हैं:-

  • अवसादी और आग्नेय चट्टानें रूप बदलकर कायान्तरित चट्टानें बन जाती हैं ।
  • कभी-कभी रूपान्तरित चट्टानों का भी रूपान्तरण हो जाता है ।
  • जिस प्रकार धरातल के नीचे मैग्मा में समाकर अवसादी चट्टानों से आग्नेय चट्टान बन सकती हैं ठीक उसी प्रकार रुपान्तरित चट्टानों से भी आग्नेय या अवसादी चट्टान बन सकती हैं । कहने का अर्थ यह कि कोई भी चट्टान अन्य प्रकार का रूप और आकार ग्रहण कर सकती है । करोड़ों वर्षों से रूपान्तरण का यह क्रम जारी है।

भौतिक परिवर्तन करने वाली शक्तियाँ

जिन शक्तियों के परिणामस्वरुप पृथ्वी के धरातल पर परिवर्तन होता है, उन्हें भौतिक परिवर्तन करने वाली शक्तियाँ कहा जाता है । ये परिवर्तन दो प्रकार के होते हैं । या तो पृथ्वी पर नये स्वरूपों का निर्माण हो जाता है; जैसे कि झील तथा पहाड़ों का बनना । या फिर पृथ्वी पर बनी हुई आकृतियाँ नष्ट हो जाती हैं; जैसे भूकम्प आदि के कारण पहाड़ों का धँस जाना ।
मुख्य रूप से दो शक्तियाँ होती हैं, जो पृथ्वी के धरातल पर रचना और विनाश करती हैं । इन्हें अन्तर्जात शक्तियाँ तथा बहिर्जात शक्तियाँ कहा जाता है ।

जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, पृथ्वी के आन्तरिक भागों में सक्रिय शक्तियों को अन्तर्जात शक्तियाँ कहते हैं । इन्हें निर्माणकारी शक्तियाँ भी कहा जाता है, क्योंकि इनके कारण पृथ्वी पर अनेक नये रूपों का निर्माण होता है । उदाहरण के लिए भूपृष्ठ पर तनाव या संकोच के कारण वलयों या परतों का निर्माण हो जाना । ये ही आगे चलकर मोड़दार पर्वतों का रूप ले लेते हैं । इसी प्रकार भूकम्प तथा ज्वालामुखी के विस्फोट से पृथ्वी के अन्दर के तरल मैग्मा के बाहर आकर जमने से अनेक नई आकृतियाँ बनती हैं । जब ज्वालामुखी का मुख सूखकर फैल जाता है, तब उसमें पानी भरने से नये झील का निर्माण हो जाता है ।

बाह्यजात शक्तियाँ उन्हें कहते हैं, जो पृथ्वी के धरातल पर सक्रिय रहती हैं , और हमें दिखाई देती है । सच तो यह है कि अन्तर्जात शक्तियों के कारण पृथ्वी पर जब कुछ रूपों का निर्माण हो जाता है, तो उससे धरातल पर विषमता आ जाती है । बाह्यजात शक्तियाँ इसी विषमता को समाप्त करने का काम करती रहती हैं । चूँकि इनका मुख्य काम धरातल के रूपों में तोड़-फोड़ करके उसे समाप्त करने का रहता है, इसलिए इन्हें विध्वंसकारी शक्ति भी कहा जाता है । बहता हुआ पानी, हवा, हिमनदी, समुद्र की तरंगें तथा भूमिगत जल आदि इसी तरह की शक्तियाँ है  जो लगातार स्थल रूपों की काँट-छाँट और घिसाई करते रहते हैं ।

काँट-छाँट, घिसाई आदि करके स्थल रुपों को क्षीण बनाने की यह प्रक्रिया ‘अनाच्छादन’ कहलाती है । अनाच्छादन में उन सभी साधनों के कार्य को शामिल किया जाता है, जिनसे धरातल के किसी भाग का विनाश या हानि हो ।
घसाई और काँट-छाँट के द्वारा तैयार हुए ये छोटे-छोटे कण जब हवा और पानी के द्वारा ले जाकर किसी एक स्थान पर जमा कर दिये जाते हैं, तो उसे ‘निक्षेपण या अपरदन’ कहते हैं ।
बाह्यजात शक्तियाँ अपना काम तीन अन्य शक्तियों के सहयोग से करती हैं । सहयोग देने वाली ये तीन शक्तियाँ हैं – सूर्य का ताप, पृथ्वी की गुरुत्त्वाकर्षण शक्ति तथा पृथ्वी की घूणन शक्ति ।

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